Friday, November 20, 2009

रात अभी बाकी है

रात अभी बाकी है - राग तेलंग


एक वक़्त था जब हम कुछ कहने को उद्यत रहते थे । चाहते थे कोई हमारी बात सुने और अपनी भी कहे । वह दौर कहने-सुनने-पढ़ने का था । आज पढ़ने-सुनने की जगह देखने ने ले ली है । आज दिखना सबसे महत्वपूर्ण हो गया है । किसी को कोई मतलब नहीं आप क्या पढ़ते-जानते-समझते हैं । उनके लिए ज़रूरी से है, आप कैसे दिखते हैं और आपके पास दिखाने लायक क्या-क्या चीज़ें हैं । आप साधारण पानी पीते हैं तो मैं आपको दिखा दूंगा कि आपके पानी में लाखों हानिकारक बैक्टीरिया हैं और मैं आपको पानी की वह बोतल बेच ही दूंगा । आप प्याऊ के पानी में भरोसा करते हैं तो मैं आपको दिखा दूंगा कि असली मर्द तो तूफानी ठंडा पीते हैं और आपकी जेब मेरे पास दौड़ी चली आएगी । आप हाथों की कला से शुभकामना पत्र बनाया करते हैं तो मैं आपको छपे-छपाए शब्द और रंगीन फोटो वाले ग्रीटिंग कार्ड दिखाकर आपका फन भुला दूंगा । इस तरह कला को उपेक्षित दृष्टि से देखने की ऐतिहासिक भूल आप कर ही बैठेंगे । यह देखने-दिखाने का दौर है । आपको हर वक़्त मेकअप की परतें ओढ़े हुए बैठना है, आपको लिपिस्टिक का अतिरिक्त बोझ ढोना ही पड़ेगा । यहां रंगीन-चिकनी मुस्कराहट बिकती है और इससे ही तय होते हैं संबंध । नए ज़माने के मुताबिक ही आप दिखें ऐसा आप पर दबाव है ।
यह समय बोनलेस भाषा का है । कुछ लोग चाहते हैं यह भाषा सब पर आरोपित हो । ऐसी भाषा जिसमें से प्रतिरोध के हथियार विकसित करने की कहीं से गुंजाइश न रहे । जो तर्क पैदा न करे, जो विचार में न बदले, जो समूहगान न बना पाए, जो जांचने-परखने का काम न करे ऐसी भाषा । क्योंकि वे जानते हैं शब्दों की ताकत और उसकी सत्ता की हैसियत । हमारा पारंपरिक संगीत भी तो शब्द का सहयात्री है । उस पर भी संकट के बादल हैं । अब सिर्फ हजारों वाट्स के शोर का संगीत होगा । अंग-प्रत्यंग को झुमा दे ऐसा संगीत फक़त । ऐसा संगीत जिसमें नाचते-नाचते हाथों में जाम थामने की आज़ादी हो, सुविधा हो । ऐसे संगीत को नशा बनाना फायदेमंद है । बाज़ार के लिए भी और नशे के व्यापार के लिए भी । यह अदृश्य गठजोड़ का समय है । ऐसे समय में संस्कृति को बचाने की लेखकों की चिंता उन्हें शोर लगती है तो क्या आश्चर्य !
जिन्हें हर वक़्त बेचते रहने की सूझती है वे सबसे पहले समय को बेचने के व्यापार से आरंभ करते हैं । ये ही लोग हैं जो बेचने के लिए ग्लैमर का शार्टकट अपनाते हैं । अख़बारों में, पत्रिकाओं में,चैनलों में और अब तो खेलों में भी । उन्होंने समय को सिकोड़ दिया है और ग्लैमर का चस्का लगाना उन्हें भलीभांति आता है । उनके लिए हर उत्सव इवेंट है और इसके लिए उनके पास निष्णात मैनेजर्स हैं । मालिकों का अब नया स्वरूप है । उन्होंने फिर भेस बदल लिया है । वे हमारे-आपके बीच आ गए हैं । वे हमारे दिमागों में हैं,प्रवृत्तियों में हैं,रहन-सहन में हैं । सावधान करने का समय जा चुका, संभलने की बारी अब किसी की नहीं । विकास के नए माॅडल के प्रणेता हैं वे ।
बदले हुए हालात में जो अच्छा है उसका तो स्वीकार होगा ही पर जो विकृत है उसका नकार आवश्यक है क्योंकि उसकी मात्रा ज्यादा है । वह संक्रमण की तरह फैल रहा है । यह विकृत मानस ही तो कह रहा है कि विचार और विचारधारा का अंत हो गया है । इतिहास का अंत हो गया है । इसलिए कि उसे सामने कोई चुनौती दिखाई नहीं देती । पर अभी तैयारी के लिए वक़्त चाहिए । औजा़रों-हथियारों की धार तेज़ करने के वास्ते, इरादे मजबूत करने के वास्ते । रात अभी बाकी है । क्या होगा रात के बाद ? लुप्त होने के संकट का भय एक दिन सबको एक कर ही देगा । बचेगा वही दरख़्त जिसकी जड़ें दूर-दूर तक फैली होंगी । खुशबू की ललक प्लास्टिक के फूलों को एक दिन ड्राइंगरूम से बाहर फेंक देगी । बच्चे रेलगाड़ी के खेल में फिर रमेंगे । बंद कमरों से फिर शुरू होगी खुले में सांस लेने की इच्छा की यात्रा। कब तक मुश्कें बांधे रखेगी आधुनिकता ? जेब भर देने का लालच पैदा करने वाले एक दिन थक जाएंगे । करोड़पति बनने के ख्वाब का गुब्बारा हकीकत की नन्ही पिन से टकरायेगा । बदलेगा सब कुछ की चाह रखने वाले समवेत जब आगे बढ़ेंगे तब एक नया अध्याय शुरू होगा ।

Thursday, November 19, 2009

आलेख

संदेह और विष्वास
विष्वास के दरवाज़ों को तालों की ज़रूरत कभी नहीं पड़ती । ताले तो संदेह की दुनिया के प्रतिनिधि हैं । संदेह करके विष्वास का दामन नहीं थामा जा सकता । दरअसल शक अपने घरों के बाहर जो ताला लगाता है, वह भय का होता है, विष्वास का नहीं । उसे हर पल डर लगा होता है कि लौटने पर संभव है ताला टूटा हुआ मिले । जहां विष्वास का घर होता है वहां की संपत्ति इस शक्ल में होती़ है कि उसे चुराना किसी के लिए कभी भी मुष्किल हो । संदेह की सारी संपत्ति भौतिक होती है । उसे धन में मापा जा सकता है । जितना अधिक धन, उतना गहरा पनपता है अविष्वास । उतनी उड़ती है रातों की नींद, उतना ही दिन का चैन । उतने ही बिकते हैं ताले, उतनी ही चोरी होती हैं चाबियां, उतने ही बढ़ते हैं अपराध, उतने ही बढ़ते हैं कानून और वकील,उतनी ही बढ़ती हैं जेलें । संदेह गैर बराबरी के समाज की खाई को और खोदता है । विष्वास परखने से पनपता है । परखने में श्रम लगता है । श्रम जहां होगा वहां पसीना भी होगा । पसीना बहाकर पाया हुआ विष्वास आत्मा के रास्ते भीतर घर बनाता है । ऐसे बने हुए घरों की दीवारें ढहाने में संदेह अक्सर लगा रहता है । संदेह ऐसे में सफल हो भी जाए तो यह सफलता क्षणिक होती है । क्योंकि बहुधा विष्वास के घर प्रेम की नदी के किनारे बने होते हैं । जिसका पानी विष्वास के पौधे को सींचता रहता है । संदेह का मैल इस पानी में नहाने से दूर हो जाता है और विष्वास का चेहरा फिर चमकने लगता है । संदेह के पास ऐसी उदात्त भावना नहीं होती । कुल मिलाकर वह बहुत गरीब होता है । वैचारिक गरीबी भौतिक गरीबी से ज्यादा ख़तरनाक होती है । वैचारिक गरीबी के परिस्थितिवष किए गए कृत्य संदेह के अस्तित्व पर संकट होते हैं । ऐसे में फिर वह झूठ पर झूठ का सहारा लेता है और सत्य से कुतर्क करता है । मगर सत्य तो विष्वास की बुनियाद पर उगे दरख़्त का चैड़ा तना होता है । और ऐसे पेड़ों के आगे आंधियों को भी हार माननी पड़ती है । संदेह की फूंक की ऐसे में क्या बिसात ! इस बाजारू समय में यह विष्वास का ही सिक्का है हमारे आदान-प्रदान के बीच जिस पर लिखा है ‘ सत्यमेव जयते ’ और जिससे अब तक दुनिया चल रही है।नतीजे पर पहुंचने से पहले समझा जा सकता है कि संदेह और विष्वास सिक्के के दो पहलू तो कतई नहीं हैं । न ही वे एक-दूसरे के सापेक्ष खड़े हैं । न ही संदेह विष्वास की प्रतिकियास्वरूप उत्पन्न हुआ होता है । संदेह दरअसल राज्य करने की इच्छा करने वालों का ऐसा हथियार है जो षड्यंत्र रचने के काम आता है । विष्वासों की हत्या के लिए एक ज़रूरी हथियार । खंड-खंड विष्वास को एकजुट होने में जितना ज्यादा समय लगेगा उतना दीर्घायु होगा संदेह का सामा्रज्य । संदेह को सिर्फ राजनीतिक सत्ताएं ही नहीं इस्तेमाल करतीं बल्कि उसका बना रहना समाज के उन ठेकेदारों के हित में भी होता है जो चाहते हैं कि उनके मुताबिक व्यवस्था और राजनीतिक सत्ताएं बनी रहें । षायद आपको जानकर हैरानी हो लेकिन यह अनुभव बताता है कि विष्वास की नन्हीं पिन की चुभन से संदेह के रंगीन गुब्बारों को उड़ाने वालों को डर लगा रहता है ।

ऽ राग तेलंग

आलेख

सरल होने की कठिनाइयांऽ राग तेलंग
लिखने बैठा हूं तो समझ आ रहा है, कितना मुष्किल है सरल लिखना ।भवानी भाई याद आते हैं, जिन्होंने कहा था ‘ जैसा हम बोलते हैं वैसा तू लिख ...।’सरल शब्द के हिज्जे बेहद सरल हैं । मगर सरल लिख सकना और सरल को प्रकट रूप में बता सकना इतना सरल भी नहीं । जिस तरह पहली-पहली बार साईकिल चलाने का मज़ा, उसे चलाते हुए हर पल गिरने के ख़तरों के बीच के अहसास से गुज़रते हुए आता है । उसी तरह सरल बात के अर्थ उस बात के सभी आयामों के जटिल कोणों को परखने के बाद समझ आते हैं ।सरल और सहज होने की कठिनाइयां सिर्फ लिखने तक ही सीमित नहीं हैं । इसका हमारी जीवन शैली और आचार-व्यवहार से भी सीधा संबंध है । कहना चाहिए अगर हम जीने और रहन-सहन में साफ-सीधे हैं तो बोलने में भी वैसे ही होंगे । सरलता का रास्ता दुर्गम घाटियों-पहाड़ियों को पार करने के बाद आता है । सरलता से कही गई बात सीधे दिल और दिमाग में उतरने की चामत्कारिक शक्ति रखती है । कबीर, तुलसी, रहीम इसीलिए आमफ़हम हैं । लेकिन हमारी षिक्षा की किताबें ज्ञान की बातों को जटिलता से पेष करती हैं । फलतः बच्चे मजबूरी में रट्टा लगाने को अभिषप्त हैं । बचपन से जवानी तक जटिलता के बादलों ने सरलता की रोषनी को ज़मीन तक पहुंचने से रोके रखा और जब तक यह रहस्य समझ में आता तब तक दूसरी पीढ़ी के हिस्से आया जटिलता का कुहासा ।दुनिया के सरलतम शब्दों का कोष मां के पास होता है । उसकी बोली और भाषा जटिल से जटिल चीज़ों को सरलीकृत ढंग से बताने के हुनर से गुंथी हुई होती है । मां की आवाज़ का सांगीतिक जादू, दुनिया का एक जटिलतम राग है, जो बड़ी सरलता से हमारे भीतर जज़्ब होता है । सभी को मां के नाम के स्कूल का साथ मिलता है पर उसका मोल उससे बिछड़ने के बाद ही समझ में आता है ।सरल करने के पहले हर सवाल की जटिलता को समझना ज़रूरी है । जटिलता को ध्यान से समझना फिर उसे मंत्र रूप देना किसी तपस्या से कम नहीं । इस तरह किए गए अथक श्रम से सरलता के ऐसे ठोस सिद्धांतों का निर्माण होता है, जिनके भीतर का गुरुत्वाकर्षण सरलता से हर किसी को अपनी ओर खींचता है । सरलता हमेषा आकर्षित ही करती है, जबकि जटिलता प्रतिकर्षित । सरल से जटिल की ओर पहुंचना हमेषा उबाऊ और खीजभरा होता है । जबकि जटिल से सरल की यात्रा रहस्य-रोमांच और उपलब्धि का सुकून देने वाली ।कहते हैं पृथ्वी पर जीव का निर्माण अनुकूल चीजों और परिस्थितियों के समागम के कारण हुआ । इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जटिलतम संयोगों और संभावनाओं के फलस्वरूप जीव का निर्माण हुआ फिर उसका अनुकूल परिस्थितियों के साथ-साथ विकास हुआ । आज मनुष्य के अस्तित्व का होना हमें भले ही आसान बात लगे मगर इसका होना एक जटिल यात्रा से होते हुए यहां तक आना है । हमारे चेहरों पर आया हुआ कोई भी सरल भाव, चाहे वह हंसी का हो या क्रोध का, वह अनेक अंगों की क्रियाओं के एक साथ एक क्षण में होने की वजह से ही है । सरल दरअसल कई जटिलताओं का एक समुच्चय है । हम कहते है ‘वह बेहद सीधा और सरल स्वभाव का है’, लेकिन सोचिये जीवन के कितने दुःखों-झंझावातों को झेलते हुये भी वह इस बेहद कठिन और असाध्य मूल्य को अपनाये हुये होगा ? ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ कहने वाले कबीर के भी तो विरोधी थे ।सरलता का जो स्वेटर हम पहनते है वह अपनी बुनावट में बेहद जटिल है, उसके एक-एक धागे के आपसी फंदों के संगुफन को वही समझ सकता है जिसने उसे बुना हो । वही अंततः साधिकार कह सकता है ‘ जैसा हम बोलते है वैसा तू लिख, फिर हमारे जैसा ही तू दिख ।’करके देखिये, कागज पर सीधी-सरल रेखा खींचना वाकई कितना कठिन है ? गौर से देखेंगे तो वह वक्र ही मिलेगी । इससे समझ आता है कि हाथ को, कलम को, नज़र को और इरादों को साधे बगैर सरल रेखा खींचना एक कठिन काम है ।

आलेख

एक घड़ी की मौत
घर में दीवाल घड़ी का एक निष्चित स्थान हुआ करता था । उस एक बेजान घड़ी से घर के सजीवों और निर्जीवों के संबंध और कार्य व्यवहार संचालित हुआ करते । आंखें घड़ी के उस स्थान को देखने की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थीं कि उस एक दिन घड़ी को वहां न पाकर उनमें पानी आ गया । आंखों में कैद उसके अक़्स की याद ने दिल में एक हूक सी भर दी । उस खाली स्थान पर घड़ी के हस्ताक्षर पढ़े जा सकते थे , जो अब अमिट हो चुके थे । घड़ियां अपनी जगह कैसे दर्ज कर लेती हैं, यह समझ में आ रहा था ।घड़ी अपने स्थान पर नही थी मगर फिर भी घर का हर बच्चा स्कूल जाते वक़्त उस स्थान पर नज़र डालता हुआ जाता था । दफ़्तर जाते समय बड़ा आदमी जल्दी-जल्दी में ही सही, उस स्थान के खाली हो जाने से, घर से भुनभुनाते हुए निकलता था और उसे लगता था कि आज पूरा दिन ही ख़राब गुज़रने वाला है । गृहिणी के कई कामों के घंटों की इबारत उस घड़ी के छोटे और बड़े कांटों के बीच बनने वाले कोणों पर टंगी होती थी । एक डायरी की तरह । उस डायरी के पन्ने चिंदी-चिंदी हो चुके थे । बुजुर्गवार उस स्थान के आसपास अब ज्यादा बेचैनी से टहलते पाये जाते । उन्हें लगता यह समय बोझ बन चुका है और अब कभी नहीं कटेगा । घड़ी के न होने से नल के आने का, दूध वाले के आने का , काम वाली का या किसी भी अपेक्षित के आने का इंतज़ार लंबा हो चुका था । उस स्थान के खाली हो जाने से सब तरफ खालीपन का अहसास हो रहा था । घड़ी के अभाव में लगता था समय शायद अनंत घंटों में बंट चुका है । सारे अंदाज़ गड्डमड्ड हो चुके थे । जीवन में चिड़ियों के चहचहाने का, रातरानी की महक फैलने का एक तय समय होता है यह महसूस किया जा सकता था । घड़ी के वहां न होने से घर का पूरा टाइम टेबल गड़बड़ा गया था । घर का सूरज पहले सूरज के साथ ही उदित और अस्त होता था, यह सामंजस्य भी टूट गया था। यह टूटना उस घर के लोगों के अंतर्संबंधों को भी बेध रहा था धीरे-धीरे । आठों पहर रात का अहसास था । किसी को दिन में भी ठीक समय पर कुछ सूझता नहीं था । उस घर के वसंत चले गए, एक घड़ी के साथ, यह बहुत बाद में मालूम पड़ा ।वह घड़ी देखने में ज़रूर कैलेंडरों की तरह आकर्षक-मादक और सेक्सी नहीं थी फिर भी वह घर में का सब कुछ बांधे रखती थी। अब उसकी जगह लगने वाली तमाम प्रस्तावित चीज़ों के नामों में सब रंगीन चीज़ें थीं मगर उन चीज़ों में घड़ी का नाम नहीं था । घड़ी इतिहास बन चुकी थी और उसका मर्सिया पढ़ने वाला कोई नहीं बचा था । उस एक घड़ी से सब अपनी घड़ियां मिलाते थे, वे घड़ियां भी शोक संतप्त थीं । उन्हें पहनने वालों के साथ भी गड़बड़झाला चल रहा था । उस घड़ी ने अपने नियत स्थान पर खड़े रहकर सबको चलना सिखाया था । उसने कई दफ़े समय के बारे में लोगों में एक फिलासफी पैदा की थी । आज समय अपने साथ है । आज बुरी घड़ी टल गई । वक़्त हमेषा एक सा नहीं रहता, कल अपना भी टाईम आएगा । समय के बारे में ऐसे दार्षनिक वाक्य उस घड़ी की उपस्थिति में ही बोले गए थे । उस वक़्त घड़ी एक दार्षनिक की तरह बिल्कुल चुप थी । समय दूसरों की भाषाओं में अपना मौन व्यक्त करता है । एक समय घर के बीचों-बीच वाला वह कमरा जो घड़ी की वजह से घड़ी वाली खोली कहलाता था, अब इलेक्ट्राॅनिक घड़ियों, लैपटाॅप,मोबाइल से अट चुका था और इससे घर के लोगों को लगने लगा कि उसे अब घड़ी वाला कमरा कहना उचित नहीं है । इस तरह मनुष्य की एक अप्रतिम खोज के नाम पर हुए कमरे का नामकरण बदलकर ड्राइंगरूम हो गया । आईने वाली खोली पीछे का बेडरूम कहाने लगी क्योंकि आइने हर कमरे में हो चुके थे । पंखे वाली खोली को तो दूसरा बेडरूम कहलाना ही था क्योंकि पंखे भी सभी कमरों में हो चुके थे । उस घड़ी की एक-एक टिक-टिक के साथ घर के एक-एक इंच का नक्षा बदल रहा था । साथ ही बदले जा रहे थे पहचान के कुछ नाम । समूचा आकाष फैल रहा था । तारे,ग्रह,पिंड सब दूर छिटक रहे थे । लगता था किसी एक बड़े से हाथ में से फिसलकर सब चीजें भाग रही हैं, एक दूसरे की विपरीत दिषाओं में । घड़ी से घर के जिन लोगों की स्मृतियों के संबंध वाबस्ता थे, वे भी अंतरिक्ष में विलीन हो चुके थे । ज़माने में बाज़ार ने घरों में इतनी घड़ियां ठूंस दी थीं कि लोग घड़ी देखते ही यह कहकर भागने को उद्यत रहते ‘ समय नहीं है ’ । आधुनिकता ने सभी घड़ियों के भीतर का समय चूस लिया था और लोग फुर्सत की एक घड़ी को तरस गए थे । लगता था सब डिजिटल गैजेट्स समय की कब्रगाह बन गए हैं । रिटायरमेंट,षादी, जन्मदिन,परीक्षा में सफलता पर घड़ी देने का रिवाज़ ख़त्म हो चुका था क्योंकि घड़ियों का बाज़ार मूल्य इतना गिर चुका था कि इस बात की पूरी आषंका थी, घड़ी पाने वाला अपमानित महसूस कर जाए । घड़ियां सुधारने वाले घड़ीसाज़ और उनकी एक आंख में लगने वाले लैंस व उस ज़माने की घड़ियां फाॅसिल्स में तब्दील होने समय की कठोर चट्टानों के भीतर चले गए थे । एक समय के बाद वह खाली स्थान कब भर गया किसी ने गौर ही नहीं किया । चूंकि समय का अनुषासन जो उस घड़ी के रहते हुआ करता था, उससे वह घर मुक्त हो चुका था । ऐसा सभी घरों में हो रहा था । यह स्वच्छंद संस्कृति के विकास का दौर था जिसमें ऐसी घड़ियों की मौत सबसे ज़रूरी थी जिनके बूते चला करती थी घरों की शांत और संतोषप्रद ज़िंदगी । संस्कृति-समाज-घर के ताने-बाने के टूटने के लिए बस एक घड़ी के लुप्त होने की ज़रूरत होती है ।एक ज़माने में एक दिन खुदाई में एक ऐसी गोल पाईपनुमा चाबी मिली जिसमें दांत नहीं थे । उस चाबी को सबने उलट-पुलट कर देखा पर कोई समझ नहीं पाया कि वह चाबी एक दीवाल घड़ी की थी ।
ऽ राग तेलंग

Saturday, April 25, 2009

कविता

कविता : राग तेलंग

मूंगफली

मूंगफली किसी के इंतज़ार के दौरान
एक घड़ी का काम करती हैं
किसी के देर से आने पर
शिकवा नहीं रह जाता
अगर हाथ में हों कुछ मूंगफली

सदियों से गरीबों को बादाम का सुख दिया है
मूंगफली ने चंद रेजगारी के बदले

जो उगाता है,जो ज़मीन से बाहर निकालता है,
जो भूनता है, जो खरीदता है
उन सबको समवेत सलाम करती हैं मूंगफली

उनके छिलकों के भीतर से खुलती हैं खिड़कियां
उम्मीदों की, सपनों की, इरादों की, सफलताओं की

हमने भी कीं कई बार
मूंगफली की गरमागरम पािZर्टयां चलते-पिफरते
हम भी बतियाये कुछ ज़्यादा मूंगफली ख़त्म होते तक
हम हुए कुछ और बदमस्त मूंगफली खाने के बाद
हमें कुछ और ज़्यादा जिलाया मूंगफली ने ध्रती पर

बहुत खुशी की ख़बर आने से पहले,
नीम तनहाइयों के दौर में,
दोस्तों की खिलखिलाहट में डूबते समय
हाथ को थामे हुए थीं तो बस मूंगफली

भीड़ के समुद्र में गुम हो जाना अच्छा लगता था
मूंगफली के कोन को पतवार की तरह थामकर

प्रवचनों के दौरान
चीन के उस साम्यवादी ईश्वर के विरुद्ध
सुना हमने प्रलाप
जिसने दरियादिली से भेजी थीं मूंगफली हमारे मुल्क में

हमने अपनी सामाजिकता के दायरे को बढ़ाते हुए
और पुख़्ता किया
मूंगफली को ईंट-गारा बनाकर

अपनी जेबें पूरी खाली कर दीं हमने
बच्चों में मूंगफली बांटकर और
आवारा राजकपूर की तरह बढ़ गए आगे
दूसरी और गलियों को आबाद करने
मूंगफली के बहाने

दुनिया में सबसे प्यारा इंसान था वो
जिसने लगाया ठेला मूंगफली का हमारे लिए और
स्नेहवश दींं दो-चार मूंगफली ज़्यादा
बिना कोई अहसान जताए
कहा हमसे `लीजिए साहब `

हां ! जनाब
हम फक्कड़ भी
कहलाए `साहब´
मूंगफली की वजह से ।


संपर्क : ०९४२५६ ०३४६०

Thursday, April 2, 2009

क़विता

परीक्षा

हम सब दिल के मरीज हैं
ऐसा हमें शक़ हुआ परीक्षा के दिन

बदल जाता था हमारा समूचा व्यक्तित्व उस एक दिन

हम एक-दूसरे से छुपा रहे थे विषय की महत्वपूर्ण जानकारियां
कोशिश कर रहे थे ऐसे-ऐसे अध्यायोंं की आड़ लेकर
जिससे लगे कि हम इस द्वंद्व युद्ध में पटखनी दे सकते हैं उसी साथी को
जिसके साथ कितनी तो बार गलबहियां डालकर
लंबी सड़क पर चलते हुए दूर किया था अपना अकेलापन

कितना बदल गया ऐसा रिश्ता परीक्षा के दिन !

चाकू की तेज़ धार से भी ख़तरनाक़ था
परीक्षा में असफल हो जाने का डर
जो कई बार
रेल की पटरियों या टिक ट्वेंटी या फिनाइल के विकल्पों को
आजमाने को मजबूर करता

हमें कभी पता नहीं चला
किसके विरूद्ध छिड़ी थी जंग
जो मांएं विदा करती थीं हमें
पेन-रबर-पेंसिल जैसे हथियारों की
ठीक-ठीक हालत के बारे में तस्दीक करते हुए

बड़ा तकलीपफ़देह था ऐसा इम्तहान
जिसमें हम जो जानते थे वह नहीं पूछा जाता
बल्कि कोशिश ये दिखती
जो हम नहीं जानते वह पूछा जाए




हमें ही हमारी बुद्धि पर तरस खाने को
मजबूर किया जाता परीक्षा के द्वारा

परीक्षा हॉल में
प्यास या पेशाब लगने जैसी सबसे स्वाभाविक क्रियाएं
संदेह का कारण बन जातीं
मुजरिम की निगाह से देखे जाते हम
और हमारे वही पूजनीय शिक्षक
एक पल को क़ातिलों के पैरोकार मुंसिफ से लगते

वहींं उड़न दस्तों पर सवार होकर अचानक आते थे
मैकाले की परीक्षा व्यवस्था के आतंकवादी पहरुए
जो ध्वस्त करते थे ज़ेहन में घुसकर
हमारे आत्मविश्वास का किला

परीक्षा देकर भारी कदमों से वापस लौटते हुए
हम सोचते थे
अगर ईश्वर या खुदा का सहारा न होता तो
किसके भरोसे छोड़ते
परीक्षाफल आते तक का वह क्रूर और जानलेवा समय

तथाकथित रूप से सफल होकर
परीक्षा के मकड़जाल से
बाहर आ चुकने के बाद भी
हम पहचान नहीं पाए अपने दुश्मन को और
आज हम भी विदा कर रहे हैं
अपने लाड़ले अभिमन्यु को देहरी पर खड़े होकर

अब कैसे बताएं साफ-साफ
कौरवों के बारे में
जाओ बच्चों जाओ
कुरुक्षेत्र की ओर
समय हो रहा है !

Saturday, March 7, 2009

कविता

अभी रुको

अभी रुको

अभी रेत के ढेर पर नन्हे हाथ हवा में कोई आकार बाँध रहे हैं

अभी घूमते हुए चाक पर मिट्टी-पानी से बन रहा है कुछ सहेज कर रखने के लिए

अभी सितार के तारों को कसा जा रहा है सही स्वर की तरफ़

अभी घर से कोई निकलने को है एक इरादे के साथ

अभी रुको

अभी हमारे दौर का यह सबसे जरुरी समय है

कुछ रचे जाने के पहले का समय।

- राग तेलंग

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