कविता
कविता : राग तेलंग
मूंगफली
मूंगफली किसी के इंतज़ार के दौरान
एक घड़ी का काम करती हैं
किसी के देर से आने पर
शिकवा नहीं रह जाता
अगर हाथ में हों कुछ मूंगफली
सदियों से गरीबों को बादाम का सुख दिया है
मूंगफली ने चंद रेजगारी के बदले
जो उगाता है,जो ज़मीन से बाहर निकालता है,
जो भूनता है, जो खरीदता है
उन सबको समवेत सलाम करती हैं मूंगफली
उनके छिलकों के भीतर से खुलती हैं खिड़कियां
उम्मीदों की, सपनों की, इरादों की, सफलताओं की
हमने भी कीं कई बार
मूंगफली की गरमागरम पािZर्टयां चलते-पिफरते
हम भी बतियाये कुछ ज़्यादा मूंगफली ख़त्म होते तक
हम हुए कुछ और बदमस्त मूंगफली खाने के बाद
हमें कुछ और ज़्यादा जिलाया मूंगफली ने ध्रती पर
बहुत खुशी की ख़बर आने से पहले,
नीम तनहाइयों के दौर में,
दोस्तों की खिलखिलाहट में डूबते समय
हाथ को थामे हुए थीं तो बस मूंगफली
भीड़ के समुद्र में गुम हो जाना अच्छा लगता था
मूंगफली के कोन को पतवार की तरह थामकर
प्रवचनों के दौरान
चीन के उस साम्यवादी ईश्वर के विरुद्ध
सुना हमने प्रलाप
जिसने दरियादिली से भेजी थीं मूंगफली हमारे मुल्क में
हमने अपनी सामाजिकता के दायरे को बढ़ाते हुए
और पुख़्ता किया
मूंगफली को ईंट-गारा बनाकर
अपनी जेबें पूरी खाली कर दीं हमने
बच्चों में मूंगफली बांटकर और
आवारा राजकपूर की तरह बढ़ गए आगे
दूसरी और गलियों को आबाद करने
मूंगफली के बहाने
दुनिया में सबसे प्यारा इंसान था वो
जिसने लगाया ठेला मूंगफली का हमारे लिए और
स्नेहवश दींं दो-चार मूंगफली ज़्यादा
बिना कोई अहसान जताए
कहा हमसे `लीजिए साहब `
हां ! जनाब
हम फक्कड़ भी
कहलाए `साहब´
मूंगफली की वजह से ।
संपर्क : ०९४२५६ ०३४६०


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