आलेख
एक घड़ी की मौत
घर में दीवाल घड़ी का एक निष्चित स्थान हुआ करता था । उस एक बेजान घड़ी से घर के सजीवों और निर्जीवों के संबंध और कार्य व्यवहार संचालित हुआ करते । आंखें घड़ी के उस स्थान को देखने की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थीं कि उस एक दिन घड़ी को वहां न पाकर उनमें पानी आ गया । आंखों में कैद उसके अक़्स की याद ने दिल में एक हूक सी भर दी । उस खाली स्थान पर घड़ी के हस्ताक्षर पढ़े जा सकते थे , जो अब अमिट हो चुके थे । घड़ियां अपनी जगह कैसे दर्ज कर लेती हैं, यह समझ में आ रहा था ।घड़ी अपने स्थान पर नही थी मगर फिर भी घर का हर बच्चा स्कूल जाते वक़्त उस स्थान पर नज़र डालता हुआ जाता था । दफ़्तर जाते समय बड़ा आदमी जल्दी-जल्दी में ही सही, उस स्थान के खाली हो जाने से, घर से भुनभुनाते हुए निकलता था और उसे लगता था कि आज पूरा दिन ही ख़राब गुज़रने वाला है । गृहिणी के कई कामों के घंटों की इबारत उस घड़ी के छोटे और बड़े कांटों के बीच बनने वाले कोणों पर टंगी होती थी । एक डायरी की तरह । उस डायरी के पन्ने चिंदी-चिंदी हो चुके थे । बुजुर्गवार उस स्थान के आसपास अब ज्यादा बेचैनी से टहलते पाये जाते । उन्हें लगता यह समय बोझ बन चुका है और अब कभी नहीं कटेगा । घड़ी के न होने से नल के आने का, दूध वाले के आने का , काम वाली का या किसी भी अपेक्षित के आने का इंतज़ार लंबा हो चुका था । उस स्थान के खाली हो जाने से सब तरफ खालीपन का अहसास हो रहा था । घड़ी के अभाव में लगता था समय शायद अनंत घंटों में बंट चुका है । सारे अंदाज़ गड्डमड्ड हो चुके थे । जीवन में चिड़ियों के चहचहाने का, रातरानी की महक फैलने का एक तय समय होता है यह महसूस किया जा सकता था । घड़ी के वहां न होने से घर का पूरा टाइम टेबल गड़बड़ा गया था । घर का सूरज पहले सूरज के साथ ही उदित और अस्त होता था, यह सामंजस्य भी टूट गया था। यह टूटना उस घर के लोगों के अंतर्संबंधों को भी बेध रहा था धीरे-धीरे । आठों पहर रात का अहसास था । किसी को दिन में भी ठीक समय पर कुछ सूझता नहीं था । उस घर के वसंत चले गए, एक घड़ी के साथ, यह बहुत बाद में मालूम पड़ा ।वह घड़ी देखने में ज़रूर कैलेंडरों की तरह आकर्षक-मादक और सेक्सी नहीं थी फिर भी वह घर में का सब कुछ बांधे रखती थी। अब उसकी जगह लगने वाली तमाम प्रस्तावित चीज़ों के नामों में सब रंगीन चीज़ें थीं मगर उन चीज़ों में घड़ी का नाम नहीं था । घड़ी इतिहास बन चुकी थी और उसका मर्सिया पढ़ने वाला कोई नहीं बचा था । उस एक घड़ी से सब अपनी घड़ियां मिलाते थे, वे घड़ियां भी शोक संतप्त थीं । उन्हें पहनने वालों के साथ भी गड़बड़झाला चल रहा था । उस घड़ी ने अपने नियत स्थान पर खड़े रहकर सबको चलना सिखाया था । उसने कई दफ़े समय के बारे में लोगों में एक फिलासफी पैदा की थी । आज समय अपने साथ है । आज बुरी घड़ी टल गई । वक़्त हमेषा एक सा नहीं रहता, कल अपना भी टाईम आएगा । समय के बारे में ऐसे दार्षनिक वाक्य उस घड़ी की उपस्थिति में ही बोले गए थे । उस वक़्त घड़ी एक दार्षनिक की तरह बिल्कुल चुप थी । समय दूसरों की भाषाओं में अपना मौन व्यक्त करता है । एक समय घर के बीचों-बीच वाला वह कमरा जो घड़ी की वजह से घड़ी वाली खोली कहलाता था, अब इलेक्ट्राॅनिक घड़ियों, लैपटाॅप,मोबाइल से अट चुका था और इससे घर के लोगों को लगने लगा कि उसे अब घड़ी वाला कमरा कहना उचित नहीं है । इस तरह मनुष्य की एक अप्रतिम खोज के नाम पर हुए कमरे का नामकरण बदलकर ड्राइंगरूम हो गया । आईने वाली खोली पीछे का बेडरूम कहाने लगी क्योंकि आइने हर कमरे में हो चुके थे । पंखे वाली खोली को तो दूसरा बेडरूम कहलाना ही था क्योंकि पंखे भी सभी कमरों में हो चुके थे । उस घड़ी की एक-एक टिक-टिक के साथ घर के एक-एक इंच का नक्षा बदल रहा था । साथ ही बदले जा रहे थे पहचान के कुछ नाम । समूचा आकाष फैल रहा था । तारे,ग्रह,पिंड सब दूर छिटक रहे थे । लगता था किसी एक बड़े से हाथ में से फिसलकर सब चीजें भाग रही हैं, एक दूसरे की विपरीत दिषाओं में । घड़ी से घर के जिन लोगों की स्मृतियों के संबंध वाबस्ता थे, वे भी अंतरिक्ष में विलीन हो चुके थे । ज़माने में बाज़ार ने घरों में इतनी घड़ियां ठूंस दी थीं कि लोग घड़ी देखते ही यह कहकर भागने को उद्यत रहते ‘ समय नहीं है ’ । आधुनिकता ने सभी घड़ियों के भीतर का समय चूस लिया था और लोग फुर्सत की एक घड़ी को तरस गए थे । लगता था सब डिजिटल गैजेट्स समय की कब्रगाह बन गए हैं । रिटायरमेंट,षादी, जन्मदिन,परीक्षा में सफलता पर घड़ी देने का रिवाज़ ख़त्म हो चुका था क्योंकि घड़ियों का बाज़ार मूल्य इतना गिर चुका था कि इस बात की पूरी आषंका थी, घड़ी पाने वाला अपमानित महसूस कर जाए । घड़ियां सुधारने वाले घड़ीसाज़ और उनकी एक आंख में लगने वाले लैंस व उस ज़माने की घड़ियां फाॅसिल्स में तब्दील होने समय की कठोर चट्टानों के भीतर चले गए थे । एक समय के बाद वह खाली स्थान कब भर गया किसी ने गौर ही नहीं किया । चूंकि समय का अनुषासन जो उस घड़ी के रहते हुआ करता था, उससे वह घर मुक्त हो चुका था । ऐसा सभी घरों में हो रहा था । यह स्वच्छंद संस्कृति के विकास का दौर था जिसमें ऐसी घड़ियों की मौत सबसे ज़रूरी थी जिनके बूते चला करती थी घरों की शांत और संतोषप्रद ज़िंदगी । संस्कृति-समाज-घर के ताने-बाने के टूटने के लिए बस एक घड़ी के लुप्त होने की ज़रूरत होती है ।एक ज़माने में एक दिन खुदाई में एक ऐसी गोल पाईपनुमा चाबी मिली जिसमें दांत नहीं थे । उस चाबी को सबने उलट-पुलट कर देखा पर कोई समझ नहीं पाया कि वह चाबी एक दीवाल घड़ी की थी ।
ऽ राग तेलंग


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