Thursday, November 19, 2009

आलेख

सरल होने की कठिनाइयांऽ राग तेलंग
लिखने बैठा हूं तो समझ आ रहा है, कितना मुष्किल है सरल लिखना ।भवानी भाई याद आते हैं, जिन्होंने कहा था ‘ जैसा हम बोलते हैं वैसा तू लिख ...।’सरल शब्द के हिज्जे बेहद सरल हैं । मगर सरल लिख सकना और सरल को प्रकट रूप में बता सकना इतना सरल भी नहीं । जिस तरह पहली-पहली बार साईकिल चलाने का मज़ा, उसे चलाते हुए हर पल गिरने के ख़तरों के बीच के अहसास से गुज़रते हुए आता है । उसी तरह सरल बात के अर्थ उस बात के सभी आयामों के जटिल कोणों को परखने के बाद समझ आते हैं ।सरल और सहज होने की कठिनाइयां सिर्फ लिखने तक ही सीमित नहीं हैं । इसका हमारी जीवन शैली और आचार-व्यवहार से भी सीधा संबंध है । कहना चाहिए अगर हम जीने और रहन-सहन में साफ-सीधे हैं तो बोलने में भी वैसे ही होंगे । सरलता का रास्ता दुर्गम घाटियों-पहाड़ियों को पार करने के बाद आता है । सरलता से कही गई बात सीधे दिल और दिमाग में उतरने की चामत्कारिक शक्ति रखती है । कबीर, तुलसी, रहीम इसीलिए आमफ़हम हैं । लेकिन हमारी षिक्षा की किताबें ज्ञान की बातों को जटिलता से पेष करती हैं । फलतः बच्चे मजबूरी में रट्टा लगाने को अभिषप्त हैं । बचपन से जवानी तक जटिलता के बादलों ने सरलता की रोषनी को ज़मीन तक पहुंचने से रोके रखा और जब तक यह रहस्य समझ में आता तब तक दूसरी पीढ़ी के हिस्से आया जटिलता का कुहासा ।दुनिया के सरलतम शब्दों का कोष मां के पास होता है । उसकी बोली और भाषा जटिल से जटिल चीज़ों को सरलीकृत ढंग से बताने के हुनर से गुंथी हुई होती है । मां की आवाज़ का सांगीतिक जादू, दुनिया का एक जटिलतम राग है, जो बड़ी सरलता से हमारे भीतर जज़्ब होता है । सभी को मां के नाम के स्कूल का साथ मिलता है पर उसका मोल उससे बिछड़ने के बाद ही समझ में आता है ।सरल करने के पहले हर सवाल की जटिलता को समझना ज़रूरी है । जटिलता को ध्यान से समझना फिर उसे मंत्र रूप देना किसी तपस्या से कम नहीं । इस तरह किए गए अथक श्रम से सरलता के ऐसे ठोस सिद्धांतों का निर्माण होता है, जिनके भीतर का गुरुत्वाकर्षण सरलता से हर किसी को अपनी ओर खींचता है । सरलता हमेषा आकर्षित ही करती है, जबकि जटिलता प्रतिकर्षित । सरल से जटिल की ओर पहुंचना हमेषा उबाऊ और खीजभरा होता है । जबकि जटिल से सरल की यात्रा रहस्य-रोमांच और उपलब्धि का सुकून देने वाली ।कहते हैं पृथ्वी पर जीव का निर्माण अनुकूल चीजों और परिस्थितियों के समागम के कारण हुआ । इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जटिलतम संयोगों और संभावनाओं के फलस्वरूप जीव का निर्माण हुआ फिर उसका अनुकूल परिस्थितियों के साथ-साथ विकास हुआ । आज मनुष्य के अस्तित्व का होना हमें भले ही आसान बात लगे मगर इसका होना एक जटिल यात्रा से होते हुए यहां तक आना है । हमारे चेहरों पर आया हुआ कोई भी सरल भाव, चाहे वह हंसी का हो या क्रोध का, वह अनेक अंगों की क्रियाओं के एक साथ एक क्षण में होने की वजह से ही है । सरल दरअसल कई जटिलताओं का एक समुच्चय है । हम कहते है ‘वह बेहद सीधा और सरल स्वभाव का है’, लेकिन सोचिये जीवन के कितने दुःखों-झंझावातों को झेलते हुये भी वह इस बेहद कठिन और असाध्य मूल्य को अपनाये हुये होगा ? ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ कहने वाले कबीर के भी तो विरोधी थे ।सरलता का जो स्वेटर हम पहनते है वह अपनी बुनावट में बेहद जटिल है, उसके एक-एक धागे के आपसी फंदों के संगुफन को वही समझ सकता है जिसने उसे बुना हो । वही अंततः साधिकार कह सकता है ‘ जैसा हम बोलते है वैसा तू लिख, फिर हमारे जैसा ही तू दिख ।’करके देखिये, कागज पर सीधी-सरल रेखा खींचना वाकई कितना कठिन है ? गौर से देखेंगे तो वह वक्र ही मिलेगी । इससे समझ आता है कि हाथ को, कलम को, नज़र को और इरादों को साधे बगैर सरल रेखा खींचना एक कठिन काम है ।

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