Friday, November 20, 2009

रात अभी बाकी है

रात अभी बाकी है - राग तेलंग


एक वक़्त था जब हम कुछ कहने को उद्यत रहते थे । चाहते थे कोई हमारी बात सुने और अपनी भी कहे । वह दौर कहने-सुनने-पढ़ने का था । आज पढ़ने-सुनने की जगह देखने ने ले ली है । आज दिखना सबसे महत्वपूर्ण हो गया है । किसी को कोई मतलब नहीं आप क्या पढ़ते-जानते-समझते हैं । उनके लिए ज़रूरी से है, आप कैसे दिखते हैं और आपके पास दिखाने लायक क्या-क्या चीज़ें हैं । आप साधारण पानी पीते हैं तो मैं आपको दिखा दूंगा कि आपके पानी में लाखों हानिकारक बैक्टीरिया हैं और मैं आपको पानी की वह बोतल बेच ही दूंगा । आप प्याऊ के पानी में भरोसा करते हैं तो मैं आपको दिखा दूंगा कि असली मर्द तो तूफानी ठंडा पीते हैं और आपकी जेब मेरे पास दौड़ी चली आएगी । आप हाथों की कला से शुभकामना पत्र बनाया करते हैं तो मैं आपको छपे-छपाए शब्द और रंगीन फोटो वाले ग्रीटिंग कार्ड दिखाकर आपका फन भुला दूंगा । इस तरह कला को उपेक्षित दृष्टि से देखने की ऐतिहासिक भूल आप कर ही बैठेंगे । यह देखने-दिखाने का दौर है । आपको हर वक़्त मेकअप की परतें ओढ़े हुए बैठना है, आपको लिपिस्टिक का अतिरिक्त बोझ ढोना ही पड़ेगा । यहां रंगीन-चिकनी मुस्कराहट बिकती है और इससे ही तय होते हैं संबंध । नए ज़माने के मुताबिक ही आप दिखें ऐसा आप पर दबाव है ।
यह समय बोनलेस भाषा का है । कुछ लोग चाहते हैं यह भाषा सब पर आरोपित हो । ऐसी भाषा जिसमें से प्रतिरोध के हथियार विकसित करने की कहीं से गुंजाइश न रहे । जो तर्क पैदा न करे, जो विचार में न बदले, जो समूहगान न बना पाए, जो जांचने-परखने का काम न करे ऐसी भाषा । क्योंकि वे जानते हैं शब्दों की ताकत और उसकी सत्ता की हैसियत । हमारा पारंपरिक संगीत भी तो शब्द का सहयात्री है । उस पर भी संकट के बादल हैं । अब सिर्फ हजारों वाट्स के शोर का संगीत होगा । अंग-प्रत्यंग को झुमा दे ऐसा संगीत फक़त । ऐसा संगीत जिसमें नाचते-नाचते हाथों में जाम थामने की आज़ादी हो, सुविधा हो । ऐसे संगीत को नशा बनाना फायदेमंद है । बाज़ार के लिए भी और नशे के व्यापार के लिए भी । यह अदृश्य गठजोड़ का समय है । ऐसे समय में संस्कृति को बचाने की लेखकों की चिंता उन्हें शोर लगती है तो क्या आश्चर्य !
जिन्हें हर वक़्त बेचते रहने की सूझती है वे सबसे पहले समय को बेचने के व्यापार से आरंभ करते हैं । ये ही लोग हैं जो बेचने के लिए ग्लैमर का शार्टकट अपनाते हैं । अख़बारों में, पत्रिकाओं में,चैनलों में और अब तो खेलों में भी । उन्होंने समय को सिकोड़ दिया है और ग्लैमर का चस्का लगाना उन्हें भलीभांति आता है । उनके लिए हर उत्सव इवेंट है और इसके लिए उनके पास निष्णात मैनेजर्स हैं । मालिकों का अब नया स्वरूप है । उन्होंने फिर भेस बदल लिया है । वे हमारे-आपके बीच आ गए हैं । वे हमारे दिमागों में हैं,प्रवृत्तियों में हैं,रहन-सहन में हैं । सावधान करने का समय जा चुका, संभलने की बारी अब किसी की नहीं । विकास के नए माॅडल के प्रणेता हैं वे ।
बदले हुए हालात में जो अच्छा है उसका तो स्वीकार होगा ही पर जो विकृत है उसका नकार आवश्यक है क्योंकि उसकी मात्रा ज्यादा है । वह संक्रमण की तरह फैल रहा है । यह विकृत मानस ही तो कह रहा है कि विचार और विचारधारा का अंत हो गया है । इतिहास का अंत हो गया है । इसलिए कि उसे सामने कोई चुनौती दिखाई नहीं देती । पर अभी तैयारी के लिए वक़्त चाहिए । औजा़रों-हथियारों की धार तेज़ करने के वास्ते, इरादे मजबूत करने के वास्ते । रात अभी बाकी है । क्या होगा रात के बाद ? लुप्त होने के संकट का भय एक दिन सबको एक कर ही देगा । बचेगा वही दरख़्त जिसकी जड़ें दूर-दूर तक फैली होंगी । खुशबू की ललक प्लास्टिक के फूलों को एक दिन ड्राइंगरूम से बाहर फेंक देगी । बच्चे रेलगाड़ी के खेल में फिर रमेंगे । बंद कमरों से फिर शुरू होगी खुले में सांस लेने की इच्छा की यात्रा। कब तक मुश्कें बांधे रखेगी आधुनिकता ? जेब भर देने का लालच पैदा करने वाले एक दिन थक जाएंगे । करोड़पति बनने के ख्वाब का गुब्बारा हकीकत की नन्ही पिन से टकरायेगा । बदलेगा सब कुछ की चाह रखने वाले समवेत जब आगे बढ़ेंगे तब एक नया अध्याय शुरू होगा ।

1 Comments:

At December 7, 2009 11:37 PM , Blogger परेश टोकेकर 'कबीरा' said...

आपके विचारों से पुर्णतः सहमत!
राग तेलंब जी आपसे एक गुजारिश है कि म.प्र. कोलार जलेस ब्लाग पर कम से कम संपर्क ईमेल जरूर देवे।

 

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