Thursday, November 19, 2009

आलेख

संदेह और विष्वास
विष्वास के दरवाज़ों को तालों की ज़रूरत कभी नहीं पड़ती । ताले तो संदेह की दुनिया के प्रतिनिधि हैं । संदेह करके विष्वास का दामन नहीं थामा जा सकता । दरअसल शक अपने घरों के बाहर जो ताला लगाता है, वह भय का होता है, विष्वास का नहीं । उसे हर पल डर लगा होता है कि लौटने पर संभव है ताला टूटा हुआ मिले । जहां विष्वास का घर होता है वहां की संपत्ति इस शक्ल में होती़ है कि उसे चुराना किसी के लिए कभी भी मुष्किल हो । संदेह की सारी संपत्ति भौतिक होती है । उसे धन में मापा जा सकता है । जितना अधिक धन, उतना गहरा पनपता है अविष्वास । उतनी उड़ती है रातों की नींद, उतना ही दिन का चैन । उतने ही बिकते हैं ताले, उतनी ही चोरी होती हैं चाबियां, उतने ही बढ़ते हैं अपराध, उतने ही बढ़ते हैं कानून और वकील,उतनी ही बढ़ती हैं जेलें । संदेह गैर बराबरी के समाज की खाई को और खोदता है । विष्वास परखने से पनपता है । परखने में श्रम लगता है । श्रम जहां होगा वहां पसीना भी होगा । पसीना बहाकर पाया हुआ विष्वास आत्मा के रास्ते भीतर घर बनाता है । ऐसे बने हुए घरों की दीवारें ढहाने में संदेह अक्सर लगा रहता है । संदेह ऐसे में सफल हो भी जाए तो यह सफलता क्षणिक होती है । क्योंकि बहुधा विष्वास के घर प्रेम की नदी के किनारे बने होते हैं । जिसका पानी विष्वास के पौधे को सींचता रहता है । संदेह का मैल इस पानी में नहाने से दूर हो जाता है और विष्वास का चेहरा फिर चमकने लगता है । संदेह के पास ऐसी उदात्त भावना नहीं होती । कुल मिलाकर वह बहुत गरीब होता है । वैचारिक गरीबी भौतिक गरीबी से ज्यादा ख़तरनाक होती है । वैचारिक गरीबी के परिस्थितिवष किए गए कृत्य संदेह के अस्तित्व पर संकट होते हैं । ऐसे में फिर वह झूठ पर झूठ का सहारा लेता है और सत्य से कुतर्क करता है । मगर सत्य तो विष्वास की बुनियाद पर उगे दरख़्त का चैड़ा तना होता है । और ऐसे पेड़ों के आगे आंधियों को भी हार माननी पड़ती है । संदेह की फूंक की ऐसे में क्या बिसात ! इस बाजारू समय में यह विष्वास का ही सिक्का है हमारे आदान-प्रदान के बीच जिस पर लिखा है ‘ सत्यमेव जयते ’ और जिससे अब तक दुनिया चल रही है।नतीजे पर पहुंचने से पहले समझा जा सकता है कि संदेह और विष्वास सिक्के के दो पहलू तो कतई नहीं हैं । न ही वे एक-दूसरे के सापेक्ष खड़े हैं । न ही संदेह विष्वास की प्रतिकियास्वरूप उत्पन्न हुआ होता है । संदेह दरअसल राज्य करने की इच्छा करने वालों का ऐसा हथियार है जो षड्यंत्र रचने के काम आता है । विष्वासों की हत्या के लिए एक ज़रूरी हथियार । खंड-खंड विष्वास को एकजुट होने में जितना ज्यादा समय लगेगा उतना दीर्घायु होगा संदेह का सामा्रज्य । संदेह को सिर्फ राजनीतिक सत्ताएं ही नहीं इस्तेमाल करतीं बल्कि उसका बना रहना समाज के उन ठेकेदारों के हित में भी होता है जो चाहते हैं कि उनके मुताबिक व्यवस्था और राजनीतिक सत्ताएं बनी रहें । षायद आपको जानकर हैरानी हो लेकिन यह अनुभव बताता है कि विष्वास की नन्हीं पिन की चुभन से संदेह के रंगीन गुब्बारों को उड़ाने वालों को डर लगा रहता है ।

ऽ राग तेलंग

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